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Men and Women are Equal but Each has Advantage over the other in Certain Aspects – Dr Zakir Naik

Men and Women are Equal but Each has Advantage over the other in Certain Aspects – Dr Zakir Naik
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अल्लाह का कुरआन का तालीम मियां बीबी दोनों को गहरी इल्म की जरुरत बहुत खुसनुमा जीवन गुजारा जा सकता है। कुरआन की इल्म दोनों को होना बहुत जरुरी है। कुरआन का इल्म लालच बुराई चुगली चोरी बदमाशी सबकुछ मीटा देता है। 😊
सूरह अन-निसा (4:34)
🔹 आसान और साफ़ हिंदी अनुवाद
मर्द औरतों के संरक्षक और जिम्मेदार हैं
क्योंकि अल्लाह ने उनमें से कुछ को दूसरे पर (ज़िम्मेदारी और कर्तव्य के लिहाज़ से) अलग बनाया,
और इसलिए कि मर्द अपनी कमाई में से ख़र्च करता है।
अच्छी (नेक) औरतें वह हैं जो आज्ञाकारी होती हैं
और अल्लाह की हिफ़ाज़त में उस चीज़ की हिफ़ाज़त करती हैं जो (शौहर की गैर-हाज़िरी में) अल्लाह ने उन्हें सौंपा है।
और जिन औरतों में ज़िद / नाफ़रमानी / रिश्ता तोड़ने का रुझान हो
तो:
1. पहले उन्हें नसीहत करो
2. अगर वह न मानें तो बिस्तर में दूरी करो
3. और अगर तब भी न मानें तो हल्का सा प्रतीकात्मक स्पर्श (बिना चोट, बिना दर्द, बिना अपमान) करो।
तो अगर वह मान जाएँ तो फिर उन पर ज़्यादती या ज़ुल्म करने का कोई रास्ता मत खोजो,
बेशक अल्लाह बड़ा और बुलंद है।
🔎 अब विस्तृत समझ
1. “क़व्वाम” का मतलब क्या है?
क़व्वाम का मतलब:
जिम्मेदारी उठाने वाला
घर का संरक्षक
कमाने वाला
सुरक्षा देने वाला
सेवा और देखभाल करने वाला
इसका मतलब हुकूमत चलाना या हुकूमत जमाना नहीं है।
इसका मतलब फर्ज और जिम्मेदारी अधिक है, अधिकार नहीं।
2. मर्द की जिम्मेदारी क्यों अधिक?
क्योंकि कमाई, सुरक्षा और बाहरी मेहनत की जिम्मेदारी मर्द पर रखी गई है।
इसलिए मर्द अपने परिवार को संभालने वाला है — न कि राज करने वाला।
3. औरत की खासियत
“हाफ़िज़ातुन लिल-ग़ैब” यानी:
घर की हिफ़ाज़त करे
रिश्ते की हिफ़ाज़त करे
इज्ज़त, इमानदारी और घर के सुकून की रखवाली करे।
4. विवाद की स्थिति में 3 स्टेप — ध्यान दीजिए:
स्टेप काम मतलब
1 नसीहत प्यार, समझदारी, बातचीत
2 बिस्तर में दूरी मसले को गंभीरता का एहसास दिलाना
3 وَاضْرِبُوهُنَّ हल्का प्रतीकात्मक संकेत (ना चोट, ना दर्द, ना बदनामी)
वह मार नहीं है।
नबी ﷺ ने कहा:
> “सबसे अच्छा आदमी वह है जो अपनी पत्नी के साथ सबसे अच्छा हो।”
(तिर्मिज़ी)
और नबी ﷺ ने कभी किसी औरत को हाथ नहीं लगाया।
इसलिए:
ज़ुल्म, मारपीट, चांटा, हिंसा — हराम है।
अगर कोई मर्द औरत को चोट पहुँचाए → गुनाहगार है।
5. अगर मामला फिर भी न सुधरे?
कुरआन कहता है:
दोनों परिवार वालों को सुलह के लिए बिठाओ (4:35)
यानी तलाक आख़िरी और मजबूरी का कदम है, पहली कोशिश नहीं।
🌸 निचोड़ (Short Summary)
इस आयत में बराबरी है, लेकिन जिम्मेदारियाँ अलग-अलग हैं।
मर्द का मक़ाम सेवा, सुरक्षा, ख़र्च और देखभाल है — हुकूमत नहीं।
औरत का मक़ाम घर, रिश्ते और अमानत की हिफ़ाज़त है।
झगड़े की हालत में तनाव कम करने और रिश्ते बचाने की प्रक्रिया बताई गई है।
हिंसा इस्लाम में हराम है — यह आयत उसका हुक्म नहीं देती।
सूरह 2:187
🔹 हिंदी अनुवाद (साफ़ और आसान)
रोज़े की रातों में तुम्हारे लिए अपनी बीवियों के पास जाना हलाल किया गया है।
वे तुम्हारे लिए लिबास हैं और तुम उनके लिए लिबास।
अल्लाह जानता है कि तुम (इससे पहले) अपने-आपके खिलाफ चोरी-छिपे (ग़लती से) ऐसा करते रहे।
तो अल्लाह ने तुम्हारी तौबा कबूल की और तुम्हें माफ़ कर दिया।
अब तुम उनसे रिश्ते निभाओ, और जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख दिया है (औलाद, नेमत, मोहब्बत), उसकी तलाश करो।
और खाओ और पियो, यहाँ तक कि सुबह की सफ़ेदी रात की सियाही से अलग दिखाई देने लगे।
फिर रात तक रोज़ा पूरा करो।
—
💡 आयत का गहरा मतलब / विस्तृत व्याख्या
इस आयत में कई महत्वपूर्ण बातें हैं:
1. “वे तुम्हारे लिए लिबास हैं और तुम उनके लिए लिबास।”
लिबास (कपड़ा) क्या करता है?
ढँकने का काम करता है (कमज़ोरियों को छुपाता है)
सुरक्षा देता है
ज़ीनत (सुंदरता) बनता है
सुकून और आराम देता है
यानी:
✅ शौहर और बीवी एक-दूसरे की कमज़ोरियों को छुपाते हैं
✅ एक-दूसरे को सुकून देते हैं
✅ एक-दूसरे की इज़्ज़त और हया की हिफ़ाज़त करते हैं
✅ एक-दूसरे को पूरा करते हैं
✅ एक-दूसरे के लिए सहारा हैं
इसका मतलब यह है कि शादी दुश्मनी नहीं, साझेदारी है।
—
2. पैग़ाम रिश्तों के लिए
मर्द और औरत की इज़्ज़त बराबर है
कोई बड़ा नहीं, कोई छोटा नहीं
भूमिका अलग, लेकिन मक़ाम बराबर
जब अल्लाह ने कहा:
> “तुम उनके लिए कपड़ा हो, और वे तुम्हारे लिए कपड़ा।”
तो यह बराबरी, मोहब्बत और ज़िम्मेदारी की सबसे खूबसूरत तश्बीह है।
—
3. रोज़े का हुक्म
रोज़े की रात में पति-पत्नी का मिलना जायज़ है
सुबह (फज्र) के बाद से मग़रिब तक रोज़ा
रात को खाना-पीना-बात करना हलाल
—
🌸 निचोड़ समझने लायक बात
शादी मजबूरी नहीं, रहमत है।
एक-दूसरे को नीचा दिखाना नहीं, एक-दूसरे को पूरा करना है।
मोहब्बत, ढँकना, सुरक्षा और सुकून — यही असल रिश्ता है।
“मर्द और औरत बराबर हैं, लेकिन दोनों के अंदर कुछ-कुछ बातें अलग-अलग बेहतर होती हैं।”
इसका मतलब ये नहीं है कि कोई बड़ा है या कोई छोटा।
बराबरी का मतलब है – इज़्ज़त, हक, इंसानियत और सम्मान में दोनों बराबर हैं।
लेकिन अल्लाह ने दोनों को अलग तरीके से बनाया है:
पहलू मर्द की ताकत औरत की ताकत
बनावट (Physical) शारीरिक ताकत ज़्यादा नर्मी, सब्र, ममता ज़्यादा
ज़िम्मेदारी (Responsibility) बाहर की मेहनत, सुरक्षा, कमाई की फ़िक्र घर की बुनियाद, बच्चों की परवरिश, घर को सुकून देना
जज़्बात (Emotional) फ़ैसलों में सख्ती और लॉजिक दिल की नर्मी और शक्लों में प्यार डालने की क्षमता
इसका मतलब:
मर्द को ताकत और जिम्मेदारी ज़्यादा दी गई है ताकि वो कमाई, सुरक्षा और बाहर की मुश्किलों का सामना कर सके।
औरत को दिल की नरमी, धैर्य और मोहब्बत ज़्यादा दी गई है ताकि वो घर, रिश्ते और बच्चों को बेहतर बना सके।
दोनों एक-दूसरे की कमी पूरी करते हैं।
जैसे दायां हाथ और बायां हाथ — दोनों बराबर हैं लेकिन काम थोड़ा अलग है।
कुरआन की हिदायत:
“औरतें तुम्हारी साझेदार और [लिबास] हैं और तुम उनके लिबास।”
(सूरह अल-बक़रह 2:187)
यानी
एक-दूसरे को ढँकने वाले, संभालने वाले, पूरा करने वाले।
निचोड़:
बराबरी है इज़्ज़त में, इंसानियत में, हक़ में।
फर्क है भूमिका और खूबी में।
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