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Men and Women are Spiritually Equal – Dr Zakir Naik



Men and Women are Spiritually Equal – Dr Zakir Naik

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21 Comments

  1. Alhamdulillah!!! 3x Salaam Alaikum Dr. Zakir. We love and highly respect you and feel so blessed to have you in the Ummah. May ALLAH exalt in to the highest and most superior of all gatherings Brother.

  2. Assalam-o-Alaikum,
    I pray this message finds you in good health and strong iman. There is someone I love sincerely and want to do Nikkah as soon as possible but facing issues.

    I humbly ask you to keep us in your duas, that Allah makes her my naseeb and grants us the blessing of nikkah, inshallah. May Allah forgive all your sins, shower you with His mercy, and accept your prayers.

    Your sincere duas, even if small, can make a big difference. Allah alone is the Best of Planners and the Most Generous. Please remember us in your prayers.

    Jazakallah khair.

  3. কুরআনে কি কোথাও পৃথিবীর বাইরে প্রাণের অস্তিত্ব নিয়ে কথা বলা হয়েছে?
    পৃথিবীর বাইরে প্রাণের অস্তিত্ব নিয়ে কুরআন কি বলে?

  4. “क्या क़ुरआन में औरतों को व्यापार (बिज़नेस), राजनीति (लीडरशिप) या शासन (गवर्नेंस) करने की इजाज़त दी गई है?”
    आइए इसे क़ुरआन और इस्लामी सिद्धांतों की रोशनी में समझते हैं।

    🌸 1️⃣ क़ुरआन में औरत की इज़्ज़त और समानता

    क़ुरआन ने यह नहीं कहा कि औरतें समाजिक, आर्थिक या राजनीतिक मामलों में हिस्सा न लें।
    बल्कि कई आयतों में बताया गया है कि औरतें ईमान, अमल और जिम्मेदारी में पुरुषों की तरह बराबर हैं।

    📖 सूरह अन-नहल (16:97)

    > "जो कोई नेक अमल करेगा — चाहे मर्द हो या औरत — और वह मोमिन हो, तो हम उसे एक पाक (अच्छी) ज़िन्दगी अता करेंगे…"

    👉 इसका मतलब यह है कि अल्लाह ने औरत को भी मेहनत, काम और सामाजिक योगदान का हक़ दिया है।

    🌸 2️⃣ औरतों का आर्थिक (Business) अधिकार

    क़ुरआन में औरत को मालिकाना हक़, व्यापार और आर्थिक लेन-देन की पूरी आज़ादी दी गई है।

    📖 सूरह अन-निसा (4:32)

    > "और अपने रब से माँगो कि जो फ़ज़्ल (बख़्शिश) उसने तुम में से कुछ को दूसरों पर दी है। मर्दों के लिए उस चीज़ का हिस्सा है जो उन्होंने कमाई, और औरतों के लिए भी उस चीज़ का हिस्सा है जो उन्होंने कमाई…"

    🔹 मतलब:
    औरतें भी कमाई कर सकती हैं, व्यापार चला सकती हैं, अपनी मेहनत का पूरा अधिकार रखती हैं।
    हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) — जो रसूलुल्लाह ﷺ की पहली पत्नी थीं — अरब की बड़ी व्यवसायी (Businesswoman) थीं।
    उनका व्यापार बहुत मशहूर था, और रसूलुल्लाह ﷺ ने खुद उनके साथ व्यापार में काम किया।
    ➡️ यानी नबी ﷺ के ज़माने में भी यह पूरी तरह जायज़ और सम्मानजनक था।

    🌸 3️⃣ राजनीति और समाज में औरत की भागीदारी

    क़ुरआन और हदीस में औरतों की सामाजिक और परामर्श (शूरा) में भागीदारी का ज़िक्र है।

    📖 सूरह अल-मुम्तहना (60:12)

    > "ऐ नबी! जब मोमिन औरतें तुम्हारे पास आएँ और इस बात पर बैअत करें (वादा करें) कि वे अल्लाह के साथ किसी को शरीक नहीं करेंगी… तो उनकी बैअत क़ुबूल कर लो और उनके लिए अल्लाह से माफ़ी माँग लो।"

    🔹 मतलब:
    औरतों ने राजनीतिक बैअत (pledge of allegiance) में हिस्सा लिया — यानी नबी ﷺ के दौर में औरतें भी समाज और शासन की नीतियों में शामिल होती थीं।

    🌸 4️⃣ हुकूमत या सियासी लीडरशिप के बारे में

    क़ुरआन ने किसी जगह औरतों को हुकूमत चलाने से मना नहीं किया।
    बल्कि इतिहास में क़ुरआन खुद एक महिला शासक (सबा की मलिका, बलक़ीस) का ज़िक्र करता है।

    📖 सूरह अन-नम्ल (27:23-44)

    > "मैंने एक औरत को पाया जो उन पर बादशाहत कर रही है, और उसे हर चीज़ दी गई है, और उसका सिंहासन बहुत बड़ा है…"
    (27:23)

    🔹 हज़रत सुलेमान (अ.) और मलिका बलक़ीस की कहानी में,
    अल्लाह ने उस महिला की अक़्ल, मशवरा और इन्साफ़ की तारीफ़ की —
    कहीं यह नहीं कहा कि “औरत को सासक नहीं होना चाहिए।”

    🌸 5️⃣ इस्लामी सिद्धांत

    इस्लाम कहता है कि किसी भी जिम्मेदारी (नेतृत्व, व्यापार या शासन) के लिए काबिलियत, ईमानदारी और अमानतदारी ज़रूरी है —
    लिंग (Gender) नहीं।

    📖 सूरह अन-निसा (4:58)

    > "अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है कि अमानतें उनके हक़दारों को पहुँचाओ, और जब लोगों में हुकूमत करो तो इन्साफ़ के साथ करो।"

    👉 यानी जो इन्साफ़, समझ और जिम्मेदारी निभा सके — वही काबिल है, चाहे मर्द हो या औरत।

    ✅ नतीजा (निष्कर्ष):

    क़ुरआन और इस्लाम के मुताबिक़ —

    औरत बिज़नेस कर सकती है।

    औरत राजनीति या समाजिक लीडरशिप में हिस्सा ले सकती है।

    औरत इंसाफ़, अमानत और तक़वा के साथ शासन भी कर सकती है।

    इस्लाम में रोक नहीं, बल्कि इज़्ज़त और बराबरी दी गई है।

  5. ✅ नतीजा (निष्कर्ष):

    क़ुरआन और इस्लाम के मुताबिक़ —

    औरत बिज़नेस कर सकती है।

    औरत राजनीति या समाजिक लीडरशिप में हिस्सा ले सकती है।

    औरत इंसाफ़, अमानत और तक़वा के साथ शासन भी कर सकती है।

    इस्लाम में रोक नहीं, बल्कि इज़्ज़त और बराबरी दी गई है।

  6. 🌷 सारांश (नतीजा):
    विषय हिदायत
    👤 मानव उत्पत्ति सारे इंसान एक ही जान (आदम) से पैदा हुए
    💞 पति-पत्नी का रिश्ता सुकून, मोहब्बत और रहमत पर आधारित
    👶 औलाद की नेमत अल्लाह की देन — उसके लिए शुक्र अदा करो
    🌙 अल्लाह की निगरानी हर अमल और नेमत उसी से है
    🌼 रूहानी संदेश:
    इस आयत से हमें तीन बड़ी बातें सीखने को मिलती हैं:
    1. मानव समानता:
    सब एक ही जान से हैं — कोई बड़ा या छोटा नहीं।
    2. रिश्तों की पवित्रता:
    पति-पत्नी का रिश्ता अल्लाह की रहमत है,
    इसे मोहब्बत और तक़वा से निभाना चाहिए।
    3. औलाद के प्रति शुक्रगुज़ारी:
    औलाद पर घमंड नहीं, बल्कि शुक्र और जिम्मेदारी ज़रूरी है।

  7. 3. “وَخَلَقَ مِنْهَا زَوْجَهَا” — “और उसी से उसका जोड़ा पैदा किया”
    अर्थात — अल्लाह ने आदम (अ.स.) से ही उनकी पत्नी हव्वा (अ.स.) को पैदा किया,
    ताकि वह उनके साथ सुकून और मोहब्बत से रहे (जैसे सूरह 7:189 में भी यही बात है)।
    इससे मालूम होता है कि:
    औरत मर्द की तरह ही अल्लाह की मख़लूक़ (creation) है।
    दोनों का रूहानी दर्जा बराबर है।
    एक दूसरे के बिना समाज अधूरा है।

  8. 🌷 सारांश (नतीजा):विषय हिदायत
    👤 मानव उत्पत्ति सब एक ही मूल (आदम व हव्वा) से हैं
    🌍 विविधता का उद्देश्य पहचान और सहयोग के लिए, न कि भेदभाव के लिए
    💖 असली इज़्ज़त सिर्फ़ तक़वा (परहेज़गारी) से
    🕋 अल्लाह की निगरानी वह दिलों के हालात जानता है
    🌼 रूहानी संदेश:
    इस आयत में इंसानियत, समानता और परहेज़गारी का पैग़ाम छिपा है
    > “कोई इंसान किसी दूसरे से ऊँचा या नीचा नहीं,
    बड़ाई सिर्फ़ उसके लिए है जो अपने रब से डरता है और नेक है।”

  9. 🌷 सारांश (नतीजा)विषय हिदायत
    👤 इंसान की शुरुआत सब एक ही नफ़्स (आदम) से पैदा हुए
    ⚖️ पुरुष–महिला समानता दोनों एक-दूसरे से हैं, बराबर दर्जे के हैं
    💞 रिश्ते रिश्तों की हिफ़ाज़त करो, मत तोड़ो
    🕋 तक़वा अल्लाह से डरते रहो, क्योंकि वह निगरान है

  10. सूरह आल-इमरान (3:195) में है, जिसमें अल्लाह तआला ने यह ऐलान किया है कि वह मर्द और औरत — दोनों के नेक अमल को बराबर इनाम देगा, और किसी के अमल को व्यर्थ नहीं जाने देगा।

    📖 सूरह آل-इमरान (3:195)

    🌿 अरबी (Arabic):

    فَاسْتَجَابَ لَهُمْ رَبُّهُمْ أَنِّي لَا أُضِيعُ عَمَلَ عَامِلٍۢ مِّنكُم مِّن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَىٰۖ بَعْضُكُم مِّنۢ بَعْضٍۢۖ فَالَّذِينَ هَاجَرُوا۟ وَأُخْرِجُوا۟ مِن دِيَـٰرِهِمْ وَأُوذُوا۟ فِى سَبِيلِى وَقَـٰتَلُوا۟ وَقُتِلُوا۟ لَأُكَفِّرَنَّ عَنْهُمْ سَيِّـَٔاتِهِمْ وَلَأُدْخِلَنَّهُمْ جَنَّـٰتٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ ثَوَابًۭا مِّنْ عِندِ ٱللَّهِۗ وَٱللَّهُ عِندَهُۥ حُسْنُ ٱلثَّوَابِ

    🌿 हिंदी अनुवाद:

    “फिर उनके रब ने उनकी दुआ क़ुबूल कर ली और फरमाया —
    ‘मैं तुम में से किसी भी अमल करने वाले का अमल व्यर्थ नहीं जाने दूँगा — चाहे वह मर्द हो या औरत; तुम सब एक-दूसरे में से हो (एक ही मूल से उत्पन्न हुए हो)।
    इसलिए जिन्होंने मेरी राह में हिजरत की, अपने घरों से निकाले गए, मेरी राह में तकलीफ़ें उठाईं, लड़े और मारे गए —
    मैं अवश्य ही उनके गुनाहों को माफ़ कर दूँगा और उन्हें ऐसे बाग़ों (जन्नतों) में दाख़िल करूँगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी।
    यह इनाम है अल्लाह की ओर से, और अल्लाह ही के पास है सबसे अच्छा बदला।’”

    🌸 विस्तृत तफ़सीर (व्याख्या):

    1. “فَاسْتَجَابَ لَهُمْ رَبُّهُمْ” — “उनके रब ने उनकी दुआ क़ुबूल की”

    यह हिस्सा उन मोमिन मर्दों और औरतों की दुआ का जवाब है जिन्होंने कहा था कि —
    “ऐ हमारे रब! हम तेरी राह में ईमान लाए, हमने तेरे नबियों की बात मानी, तो हमें माफ़ कर दे और मौत हमें नेक बन्दों के साथ दे।”
    (आयत 193–194 से इसका सिलसिला जुड़ा है।)

    2. “لَا أُضِيعُ عَمَلَ عَامِلٍ مِّنكُم مِّن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَىٰ” —

    > “मैं किसी के अमल को ज़ाया नहीं करूँगा, चाहे मर्द हो या औरत।”

    यह इस्लाम में आध्यात्मिक समानता (spiritual equality) का ऐलान है।
    अल्लाह के नज़दीक किसी का लिंग मायने नहीं रखता, बल्कि अमल और ईमान मायने रखते हैं।
    यहाँ यह भी बताया गया है कि औरत को भी वही सवाब और दर्जा मिलेगा जो मर्द को, अगर दोनों नेक अमल करें।

    3. “بَعْضُكُم مِّنۢ بَعْضٍۢ” — “तुम एक-दूसरे में से हो”

    मतलब — तुम सब एक ही इंसानियत से पैदा किए गए हो, न मर्द औरत से बेहतर, न औरत मर्द से कमतर।
    दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं — “لباسٌ لکم وأنتم لباسٌ لهنّ” (2:187) — यानी एक-दूसरे के लिए वस्त्र की तरह हैं।

    4. “فَالَّذِينَ هَاجَرُوا… وَقُتِلُوا” —

    यह उन लोगों के लिए खुशखबरी है जिन्होंने:

    हिजरत (Migration) की — ईमान की खातिर अपना घर छोड़ा,

    तकलीफें झेलीं,

    जिहाद (संघर्ष) किया, और

    अल्लाह की राह में क़ुर्बानी दी (यहाँ तक कि शहीद हुए)।

    अल्लाह उनका हर गुनाह माफ़ कर देगा और उन्हें जन्नत के बाग़ों में दाख़िल करेगा।

    5. “وَٱللَّهُ عِندَهُۥ حُسْنُ ٱلثَّوَابِ” —

    > “और अल्लाह के पास है सबसे अच्छा बदला।”

    यह वाक्य दिखाता है कि दुनिया की मेहनत का असली इनाम आख़िरत में मिलेगा,
    और वह इनाम इतना बड़ा है कि कोई इंसान उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता।

    🌷 सारांश (नतीजा):

    अल्लाह ने इस आयत में मर्द और औरत दोनों को बराबर रूहानी दर्जा दिया।

    दोनों का अमल बराबर माना गया है।

    जो अल्लाह के लिए कुर्बानी देता है, उसे गुनाहों की माफी और जन्नत का वादा है।

    यह आयत इस्लाम में लैंगिक समानता (Gender Equality) का एक मजबूत प्रमाण है — लेकिन ईमान और अमल की बुनियाद पर।

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